कभी कभी जब थक कर सो जाता हूँ,
खुद को माँ के आँचल में पाता हूँ।
वो नन्हा बचपन लौट आता है
और मैं फिर खिलखिलाता हूँ।
वो गावं के कच्चे पक्के रस्ते
जिनपर में दौड़ लगाता हूँ,
वो कोयल के मीठे गीत
वो धारों का पानी पाता हूँ।
माँ बड़े प्यार से पास बुलाती है
थाली में लेकर झोयी भात मैं खाता हूँ,
खेतों में मेरे गावं के
खेलने जाता हूँ ,
बारिश में भीगता हूँ
कागज़ की नाव बनाता हूँ।
जब कभी थक कर मैं सो जाता हूँ ,
तब अपने गावं अपनी जन्मभूमि पहुंच जाता हूँ.......

No comments:
Post a Comment